By PACHAURI GURUJI

अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनं द्वयं।
परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनं।।

वेदव्यास द्वारा रचित अठारह पुराणों का सार तत्व है कि परोपकार करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। और दूसरों को दुःख देने से पाप की प्राप्ति होती है।। अस्तु विवेक से कर्म करें।।

अथर्ववेद में गो-सूक्त

माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसाssदित्यानाममृतस्य नाभिः।
प्र नु वोचं चिकितुषे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ट।।
  गाय रुद्रों की माता,वसुओं की पुत्री,देवताओं की बहिन और
घृतरूप अमृत का खजाना है। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को चाहिए कि वह गाय की सुरक्षा करे।।
आ गावो अग्मन्नुत भद्रमक्रन्त्सीदन्तु गोष्ठे रणयन्त्वस्मे।
प्रजावतीःपुरुरूपा इह स्युरिन्द्राय पूर्वीरुषसो दुहानाः।।
     गौओं ने संसार का कल्याण किया है।वे हमारी गोशालाओं
सुख पूर्वक रहें और अपनी वाणी से हमारे कानों को पवित्र करें। ये विविध रंगों की गौएं और उनके बच्चे स्वस्थ हों,हमें
दुग्ध और घृत प्रदान करें। ।

   जगद्गुरु श्रीशंकराचार्य ज्योतिषपीठाश्वर
                श्रीव्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज कहा करते थे
   सर्वेषामेव भूतानां गावः शरणमुत्तमम्।

जब सम्पूर्ण संसार साथ छोड़ दे,तब गाय की शरण में चला जाय। अर्थात् गोमाता अशरणशरण है।।

यद् ग्रहे दुःखिता गावः स याति नरके नरः।
   अर्थात् जिस घर में गाय दुखी रहती है,वह मनुष्य नरक में
   जाता ।।

गोभिर्विप्रैश्च वेदैश्च सतीभिः सत्यवादिभिः।
अलुब्धैर्दानशीलैश्च सप्तभिर्धार्यते मही।।
        गौ,व्राह्मण,वेद,पतिव्रता स्त्री,सत्यवादी,निर्लोभी पुरुष,
        तथा दानशील पुरुष-इन सातों ने पृथ्वी को धारण कर
        रखा है। ।